प्रेरणास्पद कहानियाँ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
प्रेरणास्पद कहानियाँ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 16 अप्रैल 2014

प्रेरक कहानी

एक भिक्षुक भोजन बनाने के लिए जंगल से लकड़ियाँ चुन रहा था कि तभी उसने कुछ अनोखा देखा ।“कितना अजीब है ये !”, उसने बिना पैरों की लोमड़ी को देखते हुए मन ही मन सोचा ।“ आखिर इस हालत में ये जिंदा कैसे है ?” उसे आश्चर्य हुआ । “ और ऊपर से ये बिलकुल स्वस्थ है ” वह अपने ख़्यालों में खोया हुआ था की अचानक चारो तरफ अफरा – तफरी मचने लगी ; जंगलका राजा शेर उस तरफ आ रहा था । भिक्षुक भी तेजी दिखाते हुए एक ऊँचे पेड़ पर चढ़ गया । और वहीँ से सब कुछ देखने लगा ।शेर ने एक हिरन का शिकार किया था और उसे अपने जबड़े में दबा कर लोमड़ी की तरफ बढ़ रहा था । पर उसने लोमड़ी पर हमला नहीं किया बल्कि उसे भी खाने के लिए मांस के कुछ टुकड़े डाल दिए । “ ये तो घोर आश्चर्य है ।शेर लोमड़ी को मारने की बजाये उसेभोजन दे रहा है ।” , भिक्षुक बुदबुदाया,उसे अपनी आँखों पर भरोसा नहीं हो रहा था इसलिए वह अगले दिन फिर वहीँ आया और छिप कर शेर का इंतज़ार करने लगा ।आज भी वैसा ही हुआ । शेर ने अपने शिकार का कुछ हिस्सा लोमड़ी के सामने डाल दिया । “यह भगवान् के होने का प्रमाण है !”भिक्षुक ने अपने आप से कहा । “ वह जिसे पैदा करता है उसकी रोटी का भी इंतजाम कर देता है । आज से इस लोमड़ी की तरह मैंभी ऊपर वाले की दया पर जीऊंगा ,इश्वर मेरे भी भोजन की व्यवस्था करेगा ।” और ऐसा सोचते हुए वह एक वीरान जगह पर जाकर एक पेड़ के नीचे बैठ गया । पहला दिन बीता ,पर कोईवहां नहीं आया । दूसरे दिन भी कुछ लोग उधर से गुजर गए पर भिक्षुक की तरफ किसी ने ध्याननहीं दिया । इधर बिना कुछ खाए - पीये वह कमजोर होता जा रहा था । इसी तरह कुछ और दिन बीत गए ।अब तो उसकी रही सही ताकत भी खत्म हो गयी …वह चलने -फिरने के लायक भी नहीं रहा । उसकी हालत बिलकुल मृत व्यक्ति की तरह हो चुकी थी कि तभी एक महात्मा उधर से गुजरे और भिक्षुक के पास पहुंचे । उसने अपनी सारी कहानी महात्मा जी बताई और बोला  “अब आप ही बताइए कि भगवान् इतना निर्दयी कैसे हो सकते हैं । क्या किसी व्यक्ति को इस हालत में पहुंचाना पाप नहीं है ?” “ बिल्कुल है,”, महात्मा जी ने कहा । “ लेकिन तुम इतना मूर्ख कैसे हो सकतेहो ? तुम ये क्यों नहीं समझे कि भगवान् तुम्हे उस शेर की तरह बनते देखना चाहते थे । लोमड़ी की तरह नहीं !!!”हमारे जीवन में भी ऐसा कई बार होता है कि हमें चीजें जिस तरह समझनी चाहिए उसके विपरीत समझ लेते हैं। ईश्वर ने हम सभी के अन्दर कुछ न कुछ ऐसी शक्तियां दी हैं जो हमें महान बना सकती हैं । ज़रुरत हैं कि हम उन्हें पहचाने । उस भिक्षुक का सौभाग्य था की उसे उसकी गलती का अहसास कराने के लिए महात्मा जी मिल गए पर हमें खुद भी चौकन्ना रहना चाहिए की कहीं हम शेर की जगह लोमड़ी तो नहीं बन रहे हैं.

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

स्वाभिमान

किसी गाँव में रहने वाला एक छोटा लड़का अपने दोस्तों के साथ गंगा नदी के पार मेला देखने गया। शाम को वापस लौटते समय जब सभी दोस्त नदी किनारे पहुंचे तो लड़के ने नाव के किराये के लिए जेब में हाथ डाला। जेब में एक पाई भी नहीं थी। लड़का वहीं ठहर गया। उसने अपने दोस्तों से कहा कि वह और थोड़ी देर मेला देखेगा। वह नहीं चाहता था कि उसे अपने दोस्तों से नाव का किराया लेना पड़े। उसका स्वाभिमान उसे इसकी अनुमति नहीं दे रहा था।
उसके दोस्त नाव में बैठकर नदी पार चले गए। जब उनकी नाव आँखों से ओझल हो गई तब लड़के ने अपने कपड़े उतारकर उन्हें सर पर लपेट लिया और नदी में उतर गया। उस समय नदी उफान पर थी। बड़े-से-बड़ा तैराक भी आधे मील चौड़े पाट को पार करने की हिम्मत नहीं कर सकता था। पास खड़े मल्लाहों ने भी लड़के को रोकने की कोशिश की।
उस लड़के ने किसी की न सुनी और किसी भी खतरे की परवाह न करते हुए वह नदी में तैरने लगा। पानी का बहाव तेज़ था और नदी भी काफी गहरी थी। रास्ते में एक नाव वाले ने उसे अपनी नाव में सवार होने के लिए कहा लेकिन वह लड़का रुका नहीं, तैरता गया। कुछ देर बाद वह सकुशल दूसरी ओर पहुँच गया।
उस लड़के का नाम था ‘लालबहादुर शास्त्री’।

रविवार, 14 अक्टूबर 2012

न्याय

न्याय !!!
एक ग्वालिन नजदीक के शहर से दूध बेचकर वापस अपने गाँव आ रही थी। रास्ते में तालाब के किनारे थोड़ा -विश्राम करने बैठ गयी। वट वृक्ष की घनी छाया और पानी की ठंडी हिलोरें। थकावट के कारण ग्वालिन को नींद-सी आने लगी। उस पेड़ पर एक चंचल बन्दर का निवास था। इधर ग्वालिन को नींद आई और उधर वह बन्दर लोटे के पास रखी हुई पैसों की थैली ले भागा।
जागने पर ग्वालिन को पता लगा तो उसने बहुत देर तक बन्दर के निहोरे किये, उसके बार-बार हाथ जोड़े। काफी परेशान करने के बाद बंदर ने थैली खोली। एक पैसा तालाब के पानी में फेंकता और एक पैसा उसके लोटे में। ठीक आधी पूंजी ग्वालिन के पल्ले पड़ी। ग्वालिन को मन-ही-मन बड़ा अचरज हुआ कि यह बन्दर तो अदल न्यायी निकला, दूध के पैसे दूध में और पानी के पैसे पानी में। अनजाने में ही उसने न्यायोचित फैसला कर दिया।
साभार 'कादम्बिनी'

सफल जीवन का रहस्य

एक दिन स्वामी विवेकानन्द दुर्गाबाड़ी से माँ दुर्गा के दर्शन करके जब लौट रहे थे, तो बन्दरों का एक दल उनके पीछे लग गया। यह देखकर स्वामी जी ने कुछ भय से लम्बे-लम्बे डग भरने आरंभ कर दिए। बन्दरों ने भी उसी तेज गति से उनका पीछा जारी रखा। यह देखकर स्वामी जी और भी शंकित हो उठे और बन्दरों से छुटकारा पाने के लिए दौड़ने लगे। बन्दरों ने भी उनके पीछे दौड़ना आरंभ कर दिया। यह देखकर स्वामी जी और भी घबरा उठे और उन्हें अधिक तेज दौड़ने के सिवा बन्दरों से बच निकले का कोई दूसरा उपाय नहीं सूझ रहा था। दौड़ते-दौड़ते सांस फूलने लगी, परन्तु बन्दर थे कि पीछा छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहे थे। संयोग की बात हैं कि सामने से एक वृद्ध साधु आ रहा था। उसने संन्यासी विवेकानन्द की घबराहट की यह दशा देखकर उन्हें सम्बोधित करते हुए आवाज दी, ‘‘नौजवान रूक जाओ, भागो नहीं, बन्दरों की ओर मुँह करके खड़े हो जाओ।’’ वे बन्दरों की ओर मुँह करके खड़े हो गये। फिर क्या था, बन्दर ठिठक गए और कुछ ही क्षणों में बन्दर तितर-बितर हो गए।
इस घटना से एक बहुत बड़ी शिक्षा मिलती हैं, जो स्वामी जी ने ग्रहण की। वह यह हैं कि जीवन में विपत्तियों से छुटकारा पाने के लिए विपत्तियों का साहस पूर्वक सामना करना चाहिए। उन्होंने अमरीका के न्यूयार्क नगर में भाषण देते हुए इस घटना का वर्णन किया था और कहा, ‘‘इस प्रकार प्रकृति के विरूद्ध मुँह करके खड़े हो जाओ, अज्ञान के विरूद्ध, माया के विरूद्ध मुँह करके खड़े हो जाओ और भागो नहीं।’’ संसार में सफल जीवन बिताने का यही रहस्य हैं...

शनिवार, 29 सितंबर 2012

कर्मों का फल

जब भीष्म पितामह ने पूछा - "मेरे कौन से
कर्म का फल है जो मैं सरसैया पर पड़ा हुआ
हूँ?''

बात प्राचीन महाभारत काल की है।
महाभारत के युद्ध में जो कुरुक्षेत्र के मैंदान
में हुआ, जिसमें अठारह
अक्षौहणी सेना मारी गई,
स युद्ध के समापन और
सभी मृतकों को तिलांज्जलि देने के बाद
पांडवों सहित श्री कृष्ण पितामह भीष्म से
आशीर्वाद लेकर हस्तिनापुर को वापिस
हुए तब श्रीकृष्ण को रोक कर पितामाह ने
श्रीकृष्ण से पूछ ही लिया, "मधुसूदन, मेरे
कौन से कर्म का फल है जो मैं सर
सैया पर पड़ा हुआ हूँ?'' यह बात सुनकर
मधुसूदन मुस्कराये और पितामह भीष्म से
पूछा, 'पितामह आपको कुछ पूर्व
जन्मों का ज्ञान है?'' इस पर पितामह ने
कहा, 'हाँ''। श्रीकृष्ण मुझे अपने सौ पूर्व
जन्मों का ज्ञान है कि मैंने
किसी व्यक्ति का कभी अहित नहीं किया?
इस पर श्रीकृष्ण मुस्कराये और बोले
पितामह आपने ठीक कहा कि आपने
कभी किसी को कष्ट नहीं दिया, लेकिन एक
सौ एक वें पूर्वजन्म में आज की तरह तुमने तब
भी राजवंश में जन्म लिया था और अपने पुण्य
कर्मों से बार-बार राजवंश में जन्म लेते रहे,
लेकिन उस जन्म में जब तुम युवराज थे, तब एक
बार आप शिकार खेलकर जंगल से निकल रहे
थे, तभी आपके घोड़े के अग्रभाग पर एक
करकैंटा एक वृक्ष से नीचे गिरा। आपने अपने
बाण से उठाकर उसे पीठ के पीछे फेंक दिया,
उस समय वह बेरिया के पेड़ पर जा कर
गिरा और बेरिया के कांटे उसकी पीठ में धंस
गये क्योंकि पीठ के बल ही जाकर
गिरा था? करकेंटा जितना निकलने
की कोशिश करता उतना ही कांटे
उसकी पीठ में चुभ जाते और इस प्रकार
करकेंटा अठारह दिन जीवित रहा और
यही ईश्वर से प्रार्थना करता रहा, 'हे
युवराज! जिस तरह से मैं तड़प-तड़प कर मृत्यु
को प्राप्त हो रहा हूँ, ठीक इसी प्रकार
तुम भी होना।'' तो, हे पितामह भीष्म!
तुम्हारे पुण्य कर्मों की वजह से आज तक तुम
पर करकेंटा का श्राप लागू नहीं हो पाया।
लेकिन हस्तिनापुर की राज सभा में
द्रोपदी का चीर-हरण होता रहा और आप
मूक दर्शक बनकर देखते रहे। जबकि आप सक्षम
थे उस अबला पर अत्याचार रोकने में, लेकिन
आपने दुर्योधन और दुःशासन
को नहीं रोका। इसी कारण पितामह आपके
सारे पुण्यकर्म क्षीण हो गये और
करकेंटा का 'श्राप' आप पर लागू हो गया।
अतः पितामह प्रत्येक मनुष्य को अपने
कर्मों का फल कभी न
कभी तो भोगना ही पड़ेगा।
प्रकृति सर्वोपरि है, इसका न्याय
सर्वोपरि और प्रिय है। इसलिए पृथ्वी पर
निवास करने वाले प्रत्येक प्राणी व जीव
जन्तु को भी भोगना पड़ता है और कर्मों के
ही अनुसार ही जन्म होता है।




सोमवार, 24 सितंबर 2012

क्रोध पर विजय

एक 12-13 साल के लड़के को बहुत क्रोध आता था। उसके पिता ने उसे ढेर सारी कीलें दीं और कहा कि जब भी उसे क्रोध आए वो घर के सामने लगे पेड़ में वह कीलें ठोंक दे।

पहले दिन लड़के ने पेड़ में 30 कीलें ठोंकी। अगले कुछ हफ्तों में उसे अपने क्रोध पर धीरे-धीरे नियंत्रण करना आ गया। अब वह पेड़ में प्रतिदिन इक्का-दुक्का कीलें ही ठोंकता था। उसे यह समझ में आ गया था कि पेड़ में कीलें ठोंकने के बजाय क्रोध पर नियंत्रण करना आसान था। एक दिन ऐसा भी आया जब उसने पेड़ में एक भी कील नहीं ठोंकी। जब उसने अपने पिता को यह बताया तो पिता ने उससे कहा कि वह सारी कीलों को पेड़ से निकाल दे।

लड़के ने बड़ी मेहनत करके जैसे-तैसे पेड़ से सारी कीलें खींचकर निकाल दीं। जब उसने अपने पिता को काम पूरा हो जाने के बारे में बताया तो पिता बेटे का हाथ थामकर उसे पेड़ के पास लेकर गया।

पिता ने पेड़ को देखते हुए बेटे से कहा – “तुमने बहुत अच्छा काम किया, मेरे बेटे, लेकिन पेड़ के तने पर बने सैकडों कीलों के इन निशानों को देखो। अब यह पेड़ इतना खूबसूरत नहीं रहा। हर बार जब तुम क्रोध किया करते थे तब इसी तरह के निशान दूसरों के मन पर बन जाते थे।

अगर तुम किसी के पेट में छुरा घोंपकर बाद में हजारों बार माफी मांग भी लो तब भी घाव का निशान वहां हमेशा बना रहेगा।

अपने मन-वचन-कर्म से कभी भी ऐसा कृत्य न करो जिसके लिए तुम्हें सदैव पछताना पड़े...!!