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रविवार, 15 नवंबर 2015

त्योहर बाद का जीवन

त्योहार बाद जब अपने बिखरते है तो कितना बुरा लगता है पर ये तो प्रकृति का नियम है कि बहार के बाद पतझड़ तो आएगा ही. हमें तो त्योहार बाद कुछ ऐसा लगता है कि जैसे कहीं घूमने गए थे और अब वापस लौट आये है। हमारे बुजुर्ग बहुत ही अनुभवी और मानवीय स्वभाव की गहरी समझ रखने वाले थे तभी उन्होंने त्योहार बनाये वर्ना परिवार के लोगो का आपस में मिलना बहुत मुश्किल हो जाता है। कभी कभी ऐसा लगता है कि सब लोग आगे बढ़ रहे है परन्तु मैं नहीं।  मानव जीवन और बहता हुआ समय एक बार ही मिलता है पर मुझे कभी-कभी लगता है कि मैंने उसको उतनी ही लापरवाही से खर्च कर दिया है पर क्या क्षतिपूर्ति संभव है नहीं परन्तु हाँ पिछली घटनाओं से सबक ले कर आगे का जीवन सुनहरा किया जा सकता है जिस प्रकार एक बच्चा गर्म दूध का अनुभव कर आगे से उसे ठंडा कर ही पीता है।

मंगलवार, 24 सितंबर 2013

मेरा निजी जीवन दर्शन

कभी-कभी मुझे बहुत आश्चर्य होता है कि मै खुद के बारे में कितना कम जानता हूँ । खुद से सवाल पूछता हूँ कि मै खुद के बारे में ज्यादा से ज्यादा कैसे जान सकता हूँ । सवाल कई है पर जवाब नहीं । इन सवालों के जवाब कंहा मिलेंगे ये भी नहीं पता । इंसानी जीवन का सबसे मूलभूत प्रश्न यही है कि मेरा उद्देश्य क्या है और आज उसी स्थिति से मै जूझ रहा हूँ । ना ही कोई मार्गदर्शक है और न ही कोई सहायता देने वाला । सब कुछ खुद को ही करना है । एक बात मैंने अपने जीवन से सीखी है वो ये कि दुनिया में इंसान अकेला आता है और अकेला ही मरता है तथा अकेला ही जीता है देखने के लिए तो दोस्त, परिवार, रिश्तेदार आदि लोग होते है पर वास्तव में देखा जाए तो इंसान सारी जिन्दगी अकेला ही जीता है । पर एक सत्य यह भी है कि इनके बिना भी हमारी जिंदगी एक बोझ सी लगने लगेगी ।इस जीवन को जीने का सार्थक तरीका है लक्ष्य को तय करना और उसकी पूर्ति में लगे रहना ।