रविवार, 16 अप्रैल 2017

कोलकाता, गुवाहाटी, शिलांग, चेरापूंजी की यात्रा २

कोलकाता हम दो बजे पहुंच गये। एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही वातानुकूलित बस मिल गई जिसके जरिये हम हावड़ा पहुंच गये। वंहा होटल तलाश किया तो न्यू अशोका होटल एक गली में मिला गया। होटल ठीक ठाक था इसलिए हमने कमरा बुक कर लिया किराया ९०० रूपये के लगभग था। कमरे पहुंच कर तुरंत सामान रखा और तरोताजा होकर निकल लिए बस अड्डे की ओर वंहा जाकर पता चला कि ४८ नं की बस दक्षिणेश्वर काली मंदिर जाती है तो हमने सोचा कि उसी से निकल पडे पर वो काफी देरी से थी तो हमने एक आटो वाले से ३०० रूपये में तय किया। आटो वाला आटो चलाने में काफी तेज था पर फिर भी जाम की वजह से हमें मंदिर तक पहुंचने में ४५ मिनट का समय लग ही गया। वंहा जब हम पहुंचे तब लाइन लगनी शुरू ही हुई थी कि हम पहुंच गये खैर थोड़ी देर बाद ही आरती शुरू हो गई आरती खत्म होने के बाद मंदिर के पट माँ के दर्शन हेतु खुले। दक्षिणेश्वर काली माता के दर्शन करने पश्चात हमें थोडी देर के इंतजार के बाद बस मिल गई जिसका प्रति व्यक्ति किराया १० रूपये मात्र था इतनी दूरी तय करने के आटो वाले पांच सौ रूपये तक मांग रहे थे। हावड़ा पहुंच कर वंहा एक लिट्टी चोखा की दुकान मिल गई जिसके लिट्टी चोखा खाकर आनंद आ गया। शेष अगली पोस्ट में

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

कोलाकाता, गुवाहाटी, शिलांग, चेरापूंजी की यात्रा १

इस बार हमारा कोलकाता गुवाहाटी शिलांग घूमने का विचार बना तो हम ट्रेन के लिए पता करने लगे। ट्रेन मे सीटों की उपलब्धता भी मिली पर फिर विचार आया कि क्यों ना फ्लाइट के बारे मे पता किया जाये पता चला कि लखनऊ से ११ः५५ पर फ्लाइट है जिसका तीन लोगों का किराया ७६७३ रूपये मात्र है। टिकट की कीमत किफायती लगी और समय बचाने लिए भी फ्लाइट की यात्रा ठीक लगी इसलिए टिकट तीन लोगों की बुक कर ली गई पर हाँ टिकट हमने २२ मार्च को बुक की थी और यात्रा की तारीख थी ०५ अप्रैल तो यात्रा से जितना पहले आप फ्लाइट टिकट बुक करते है उतनी सस्ती टिकट आप प्राप्त कर सकते है खैर घर से हम ०८ बजे निकले और १० बजे पहुंच गए एयरपोर्ट वंहा ११ बजे तक घूमते और फोटोग्राफी करते रहे फिर उसके बाद सामान की स्केनिंग के बाद इंडिगो के काउंटर पर चेकइन किया व सामान उनको सौंपा। फ्लाइट ने १५ मिनट की देरी से उडान भरी। १ः५० पर हम कोलकाता पहुंच गये।

मंगलवार, 11 अक्तूबर 2016

यमुनोत्री


यमुनोत्री में यमुना नदी का मंदिर है जिसको जयपुर की महारानी गुलेरिया ने 19वीं सदी में बनवाया था परन्तु भूकंप की वजह से मंदिर क्षतिग्रस्त हो गया जिसका  पुर्ननिर्माण टिहरी गढ़वाल के राजा प्रताप शाह ने करवाया। यमुनोत्री मंदिर उत्तरकाशी जिले के बड़कोट तहसील में स्थित है जिसकी समुद्र तल से ऊंचाई 3235 मी है। इस स्थान को पौराणिक काल में असित मुनि का निवास स्थान भी माना जाता है। यंहा तक पहुँचने का मोटर मार्ग हनुमान चट्टी तक ही है उसके उपरांत पैदल रास्ता नारद चट्टी, फूल चट्टी और जानकी चट्टी होकर गुजरता है। जानकी चट्टी का नाम एक महिला के नाम पर पड़ा जिन्होंने वंहा सर्वप्रथम एक धर्मशाला का निर्माण कराया। यंहा जाने का सर्वोत्तम समय मई से अक्टूबर है उसके उपरांत यंहा सब हिमाच्छादित हो जाता है. मुझे यंहा का खाना बहुत ही सादा लगा।

रविवार, 18 सितंबर 2016

बड़कोट से यमुनोत्री की यात्रा

हमने रात्रि को बड़कोट में ही विश्राम किया और फिर सुबह ही स्नान कर छः बजे के पहले ही यमुनोत्री के लिए निकल पड़े। बड़कोट से यमुनोत्री की दूरी लगभग 46 किमी है जिसको तय करने में हमें लगभग डेढ़ घंटे का समय लगा। हम साढ़े सात बजे यमुनोत्री पहुंचे। गाड़ियां पार्किंग जोन में ही खड़ी हो जाती है उसके बाद पैदल ही चलना पड़ता है हम लोग अपना जरुरी सामान लेकर बाकि का सामान गाड़ी में छोड़ दिया और ट्रैकिंग के लिए निकल पड़े। यंहा हमें पता चला कि बगैर तैयारी के आना कैसा होता है सिर्फ छः किमी की चढ़ाई चढने में ही हमारा दम निकल गया। चार घंटे की ट्रैकिंग के बाद हम यमुनोत्री मंदिर पहुंचे जंहा पहले हम नदी की धारा के पास गए वंहा हमने देखा की धारा में जगह जगह साड़ियां बिखरी पड़ी है जो कि भक्त लोग माँ यमुना को अर्पित करते है। उस नदी का पानी इतना बर्फीला था कि उसमे दस सेकेंड भी खड़ा होना मुश्किल था। बहुत देर बैठने के बाद हमने हिम्मत करके उसमे स्नान किया शरीर तो जैसे सुन्न हो गया उसके तुरन्त बाद हम गर्म पानी के कुण्ड में स्नान करने के लिए उतर गए जी हाँ यंहा गर्म पानी का कुण्ड भी है वो भी प्राकृतिक। बताते है कि इस कुण्ड में स्नान करने से कई प्रकार के चर्म रोग सही हो जाते है। यंहा गर्म पानी के कुण्ड में पुरुषों और महिलाओं के स्नान के लिए अलग-अलग व्यवस्था है। यंहा स्नान करने के पश्चात् सारी थकावट उतर जाती है और मन तरोताजा हो जाता है। कुण्ड में स्नान करते समय एक भाई सेल्फ़ी स्टिक से फ़ोटो खींच रहे थे जिन्होंने हमारी फ़ोटो भी खींची जो नीचे है। फिर माँ यमुनोत्री के दर्शन किये और वंहा चावल का प्रसाद चढ़ता है जिसको बाद में वंहा के गर्म पानी के कुण्ड में दस मिनट डालने से वो पक जाता है जिसको घर में लाकर खीर या अन्य किसी प्रसाद में मिला कर खाया जाता है। यंहा भी एक व्यक्ति चावल पकाने के प्रति पोटली दस रुपए वसूल रहे थे। स्नान और दर्शन में एक बज गया मतलब हमें स्नान और दर्शन करने में मात्र एक घंटे का ही समय लगा। उसके पश्चात् हमने उतराई आरम्भ की। पहाड़ों से उतरते समय उतनी मेहनत नहीं लगती जितनी चढ़ने में। उतरने में हमें दो घंटे का ही समय लगा। उसके बाद हम लोगो ने भोजन किया और निकल पड़े गंगोत्री की ओर।
रास्ते में पुल
यमुनोत्री मार्ग पर सुन्दर दृश्य
बर्फ से ढकी चोटियाँ
पहाड काट कर बनाया गया रास्ता
साफ सुन्दर नीला आसमान
मन्दिर जाते हुए रास्ते में
चढाई चढते हुए
रास्ते मे पुल
मनमोहक दृश्य
गर्म पानी का तप्त कुंड
माँ यमुनोत्री का मंदिर
ध्यान मुद्रा में 

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

हरिद्वार से बड़कोट की यात्रा

हम हरिद्वार लगभग साढ़े छः बजे पहुंचे जिसके बाद हमने सबसे पहला काम आगे की यात्रा के लिए साधन की  तलाश करना शुरु किया। वंहा सभी टैक्सी और प्राइवेट बस ऑपरेटर ने यूनियन बना रखी है जिससे चार धाम या अन्य जगह जाने का रेट प्रतिदिन बदलता रहता है। खैर एक मिनी बस एक घंटे बाद मिली जिसमें प्रति व्यक्ति 2600 ₹ किराया तय हुआ जिस हिसाब से चार व्यक्तियों का 10400₹ का भुगतान हुआ। यंहा पर हम लोगों से एक गलती हो गयी हमने सीट पकड़ने में विलम्ब कर दिया जिसकी वजह से हमें पीछे वाली सीट मिली बस की पीछे की सीट में धक्के बहुत ज्यादा लगते है जिससे पूरे सफ़र हमारी हालत ख़राब रही। बस हरिद्वार से निकली और देहरादून और मसूरी होते हुए आगे बढ़ी। देहरादून से पहाड़ी इलाका शुरू हो जाता है। मसूरी भी बढ़िया हिल स्टेशन है।
हरिद्वार से यमुनोत्री की दूरी 250 किमी के लगभग है। हम हरिद्वार से बड़कोट पहुंचे जंहा पर रात्रि विश्राम किया। बड़कोट को 2014 में ही नगरपालिका का दर्जा मिला है। बड़कोट को सहस्त्रबाहु की नगरी भी कहा जाता है। यह भी एक सुंदर नगर है।
रास्ते में
मसूरी रोड मे स्थित मन्दिर
मनोरम दृश्य
मसूरी का दृश्य
यंहा नाश्ता किये थे