रविवार, 15 नवंबर 2015

त्योहर बाद का जीवन

त्योहार बाद जब अपने बिखरते है तो कितना बुरा लगता है पर ये तो प्रकृति का नियम है कि बहार के बाद पतझड़ तो आएगा ही. हमें तो त्योहार बाद कुछ ऐसा लगता है कि जैसे कहीं घूमने गए थे और अब वापस लौट आये है। हमारे बुजुर्ग बहुत ही अनुभवी और मानवीय स्वभाव की गहरी समझ रखने वाले थे तभी उन्होंने त्योहार बनाये वर्ना परिवार के लोगो का आपस में मिलना बहुत मुश्किल हो जाता है। कभी कभी ऐसा लगता है कि सब लोग आगे बढ़ रहे है परन्तु मैं नहीं।  मानव जीवन और बहता हुआ समय एक बार ही मिलता है पर मुझे कभी-कभी लगता है कि मैंने उसको उतनी ही लापरवाही से खर्च कर दिया है पर क्या क्षतिपूर्ति संभव है नहीं परन्तु हाँ पिछली घटनाओं से सबक ले कर आगे का जीवन सुनहरा किया जा सकता है जिस प्रकार एक बच्चा गर्म दूध का अनुभव कर आगे से उसे ठंडा कर ही पीता है।

शनिवार, 24 अक्टूबर 2015

बेंजामिन फ्रैंकलिन

इधकर कुछ दिनों से बेंजामिन फ्रैंकलिन की आत्मकथा पढ़ रहा हूँ । बहुत ही धनी व्यक्तिव और बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे बेंजामिन फ्रैंकलिन । एक आविष्कारक, राजनीतिज्ञ और समाज सुधारक की भूमिका में थे वे । उनका जीवन अनुकरणीय है युवाओं के लिए कि कैसे संघर्षो का सामना किया ज़ाए । उनके आत्म कथा अपने पुत्र को लिखे पत्र के प्रारूप में है पर लिखने की शैली रुचिकर है अपनी आत्म कथा में इन्होंने अपने परिवार के इतिहास का भी बखूबी वर्णन किया है। बेंजामिन फ्रैंकलिन को शुरुआत से ही किताबों का पढ़ने का शौक था जिसने उनके व्यक्तिव पर गहरा प्रभाव डाला. उस समय उन्होंने उन कामो को अंजाम दिया जो हमें बहुत ही मुश्किल लगते है.

एप्प परीक्षण polaris office +pdf

                                                         एप्प  परीक्षण
आज मैंने एक नया एप्प डाउनलोड किया जिसका नाम polaris office +pdf है. इस एप्प पर ही यह लेख लिखा गया है. इस एप्प पर हिन्दी लिखने और पढ़ने में कोई समस्या नहीं है इस एप्प का और स्क्रीन शाट संलग्न है. यह एप्प 45.3 एमबी का है जोकि  मोबाइल में 135 एमबी की जगह लेता है. पर इसमें कुछ सुविधाएं सिर्फ प्रीमियम उपभोक्तओं को ही दी गयी है जैसे पासवर्ड, क्लाउड सुविधा  
  

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2015

सच्चा उद्देशय

अभी हाल में ही एक फ़िल्म देखी जिसका नाम था लूसी उसमे एक बहुत ही बढ़िया बात कही गई मानव सभ्यता के बारे में। उसमे बताया गया कि मानव सभयता में ज्ञान और अनुभव एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचते रहे और शरीर की प्रत्येक कोशिका का काम भी यही है अपनी जानकारी को दूसरी कोशिका को देना और मानव का सच्चा उद्देशय भी यही होना चाहिये कि जो ज्ञान उसके पास है वो आगे की पीढ़ी भी प्राप्त करे न कि वो वही समाप्त हो जाए. तो मुझे भी यह तर्क और उद्देश्य सही लगा और तब मैंने निश्चय किया कि आज से मैं जो भी ज्ञान या कुछ नया सीखूंगा तो उसे दूसरों से साझा अवश्य करूंगा इसीलिए अब मेरा ब्लॉग नियमित अपडेट रहेगा हाँ समयाभाव इसमें आगे आड़े आ सकता है और कुछ नहीं.

गुरुवार, 21 अगस्त 2014

अब बैंक एसएमएस में भी हिन्दी

अब एक कम्पनी ने बैंक एसएमएस भी हिन्दी भाषा में भेजने की तैयारी कर ली है । अब जल्द ही हमें अपने बैंक से हिन्दी में एसएमएस प्राप्त होंगे ।


सोमवार, 28 अप्रैल 2014

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग

यंहा भीमा नदी बहती है जिसे चंद्रभागा भी कहते है ।
भीमाशंकर समुद्र से ३५०० फुट की ऊंचाई पर स्थित है ।
भीमाशंकर सहयाद्री पर्वत मालाओं में स्थित है आरती का समय २.४५ से ३.०० के बीच है ।यह भोरगिरि गाँव में स्थित है ।
यंहा भीमाशंकर-मंचोर मार्ग से वाया डिम्ब जाया जाता है जिसका समय पौने दो घंटे है ।
यंहा मंदिर के सामने एक बहुत ही पुरानी घंटी है ।
यह पुणे से११० किलोमीटर दूर है इसके बाद आप नागफनी और साक्षी विनायक मंदिर जा सकते है ।
इस जगह को १९८५ में ही वाइल्ड लाइफ सेनचुरी घोषित किया जा चूका है जिसका एरिया १३० वर्गकिमी है ।


बुधवार, 16 अप्रैल 2014

प्रेरक कहानी

एक भिक्षुक भोजन बनाने के लिए जंगल से लकड़ियाँ चुन रहा था कि तभी उसने कुछ अनोखा देखा ।“कितना अजीब है ये !”, उसने बिना पैरों की लोमड़ी को देखते हुए मन ही मन सोचा ।“ आखिर इस हालत में ये जिंदा कैसे है ?” उसे आश्चर्य हुआ । “ और ऊपर से ये बिलकुल स्वस्थ है ” वह अपने ख़्यालों में खोया हुआ था की अचानक चारो तरफ अफरा – तफरी मचने लगी ; जंगलका राजा शेर उस तरफ आ रहा था । भिक्षुक भी तेजी दिखाते हुए एक ऊँचे पेड़ पर चढ़ गया । और वहीँ से सब कुछ देखने लगा ।शेर ने एक हिरन का शिकार किया था और उसे अपने जबड़े में दबा कर लोमड़ी की तरफ बढ़ रहा था । पर उसने लोमड़ी पर हमला नहीं किया बल्कि उसे भी खाने के लिए मांस के कुछ टुकड़े डाल दिए । “ ये तो घोर आश्चर्य है ।शेर लोमड़ी को मारने की बजाये उसेभोजन दे रहा है ।” , भिक्षुक बुदबुदाया,उसे अपनी आँखों पर भरोसा नहीं हो रहा था इसलिए वह अगले दिन फिर वहीँ आया और छिप कर शेर का इंतज़ार करने लगा ।आज भी वैसा ही हुआ । शेर ने अपने शिकार का कुछ हिस्सा लोमड़ी के सामने डाल दिया । “यह भगवान् के होने का प्रमाण है !”भिक्षुक ने अपने आप से कहा । “ वह जिसे पैदा करता है उसकी रोटी का भी इंतजाम कर देता है । आज से इस लोमड़ी की तरह मैंभी ऊपर वाले की दया पर जीऊंगा ,इश्वर मेरे भी भोजन की व्यवस्था करेगा ।” और ऐसा सोचते हुए वह एक वीरान जगह पर जाकर एक पेड़ के नीचे बैठ गया । पहला दिन बीता ,पर कोईवहां नहीं आया । दूसरे दिन भी कुछ लोग उधर से गुजर गए पर भिक्षुक की तरफ किसी ने ध्याननहीं दिया । इधर बिना कुछ खाए - पीये वह कमजोर होता जा रहा था । इसी तरह कुछ और दिन बीत गए ।अब तो उसकी रही सही ताकत भी खत्म हो गयी …वह चलने -फिरने के लायक भी नहीं रहा । उसकी हालत बिलकुल मृत व्यक्ति की तरह हो चुकी थी कि तभी एक महात्मा उधर से गुजरे और भिक्षुक के पास पहुंचे । उसने अपनी सारी कहानी महात्मा जी बताई और बोला  “अब आप ही बताइए कि भगवान् इतना निर्दयी कैसे हो सकते हैं । क्या किसी व्यक्ति को इस हालत में पहुंचाना पाप नहीं है ?” “ बिल्कुल है,”, महात्मा जी ने कहा । “ लेकिन तुम इतना मूर्ख कैसे हो सकतेहो ? तुम ये क्यों नहीं समझे कि भगवान् तुम्हे उस शेर की तरह बनते देखना चाहते थे । लोमड़ी की तरह नहीं !!!”हमारे जीवन में भी ऐसा कई बार होता है कि हमें चीजें जिस तरह समझनी चाहिए उसके विपरीत समझ लेते हैं। ईश्वर ने हम सभी के अन्दर कुछ न कुछ ऐसी शक्तियां दी हैं जो हमें महान बना सकती हैं । ज़रुरत हैं कि हम उन्हें पहचाने । उस भिक्षुक का सौभाग्य था की उसे उसकी गलती का अहसास कराने के लिए महात्मा जी मिल गए पर हमें खुद भी चौकन्ना रहना चाहिए की कहीं हम शेर की जगह लोमड़ी तो नहीं बन रहे हैं.

सोमवार, 2 दिसंबर 2013

हिटलर - एक अनोखा क्रूर व्यक्तित्व

इस समय मै हिटलर की जीवनी पढ़ रहा हूँ । हिटलर का व्यक्तित्व  भी अनोखा था उसने मानव समाज को दिखला दिया कि व्यक्ति कोई भी ऊंचाई प्राप्त कर सकता है बस उसमे आत्म विश्वास और आत्म निष्ठा होनी चाहिए । हिटलर का एक और प्रमुख गुण ये था कि वो मानवीय गुणों को जबरदस्त पारखी था । उसे बखूबी मालूम था कि किस व्यक्ति को क्या चाहिए और वो उस व्यक्ति की वो इच्छा पूरी करता था और वो उससे अपना काम बखूबी लेता था । उसके हिंसक और खतरनाक इरादों को बहुत ही कम लोग भाप पाए । उसके शुरूआती जीवन मे किसी को भी ये अहसास नहीं था कि एक साधारण सा युवक एक दिन जर्मनी का सर्वेसर्वा बन जायेगा और पूरे विश्व को भीषण युद्ध की विभीषिका मे झोंक देगा ।

मंगलवार, 24 सितंबर 2013

मेरा निजी जीवन दर्शन

कभी-कभी मुझे बहुत आश्चर्य होता है कि मै खुद के बारे में कितना कम जानता हूँ । खुद से सवाल पूछता हूँ कि मै खुद के बारे में ज्यादा से ज्यादा कैसे जान सकता हूँ । सवाल कई है पर जवाब नहीं । इन सवालों के जवाब कंहा मिलेंगे ये भी नहीं पता । इंसानी जीवन का सबसे मूलभूत प्रश्न यही है कि मेरा उद्देश्य क्या है और आज उसी स्थिति से मै जूझ रहा हूँ । ना ही कोई मार्गदर्शक है और न ही कोई सहायता देने वाला । सब कुछ खुद को ही करना है । एक बात मैंने अपने जीवन से सीखी है वो ये कि दुनिया में इंसान अकेला आता है और अकेला ही मरता है तथा अकेला ही जीता है देखने के लिए तो दोस्त, परिवार, रिश्तेदार आदि लोग होते है पर वास्तव में देखा जाए तो इंसान सारी जिन्दगी अकेला ही जीता है । पर एक सत्य यह भी है कि इनके बिना भी हमारी जिंदगी एक बोझ सी लगने लगेगी ।इस जीवन को जीने का सार्थक तरीका है लक्ष्य को तय करना और उसकी पूर्ति में लगे रहना ।

सोमवार, 9 सितंबर 2013

दक्षिण भारत की यात्रा की शुरूआत

दक्षिण भारत का एक स्टेशन

सुन्दर पहाडी द्रश्य

सुन्दर प्रतिमा तिरूपति नगर मे स्थित
मै हमेशा अपने दोस्तों से कहता हूँ कि मै लम्बे समय की योजनाएँ नहीं बनाता हूँ खासकर पर्यटन की तो नहीं । मै हमेशा पर्यटन कि योजना दो या तीन दिन पहले ही बनाता हूँ । इस बार भी यहीं हुआ । एक दोस्त ने तीन दिन पहले पूछा कि दक्षिण भारत घूमने चलना है चलोगे तो मैने कहा अगले दिन बतायेंगे । देखा रोजगार भी धीमी गति मे हैं । घर मे पूछा तो इजाजत मिल गई इसलिए हाँ कर दी । बस फिर क्या हमारा बैग पैक हो गया और दो दिन बाद वो शुभ घडी आ ही गई अर्थात २०-७-२०‍१३ को जब हमे निकलना था । सबसे पहले तो हम कानपुर सैट्रंल रेलवे स्टेशन पहुँचे जँहा से हमारी ट्रैन थी झांसी इण्टरसिटी एक्सप्रेस जिसका समय था शाम को ०६ बजकर ३० मिनट । खैर जिसके लिए भारतीय रेल मशहूर है  वो ट्रैन चली ०६ बजकर ४५ मिनट पर जिसने हमें पहुचाँया ‍१‍१ बजे झाँसी स्टेशन पर । हमारा मन तो बहुत था झाँसी घूमने का पर मन मसोस कर रह गये  वीरबालाओं की धरती पर भ्रमण करने को क्योंकि हमारी ट्रेन  जो थी ०‍१ बजकर ‍१० मिनट की । इसलिए हमें स्‍टेशन पर रूक कर ही दो घण्टे का समय बिताना था । इस पर्यटन कार्यकम्र मे पाँच लोग थे । 



सोमवार, 1 जुलाई 2013

मन के जज्बात

अमरनाथ जाते हुए मार्ग मे
आज इतने दिनों बाद लेखन करने बैठा हूँ तो सोचता हूँ क्या लिँखू ? बस अब मन में यही आ रहा है कि अपने मन के जज्बात लिखूँ क्योंकि उन्हें मै किसी से साझा नहीं कर पाता हूँ । सच कहूँ तो अब तक ऐसा कोई मित्र मिला ही नहीं जिससे अपने मन की बात साझा कर सकूँ । मन भी एक सागर की तरह है कभी शांत तो कभी विचार रूपी लहरें उठा करती है । यहीं मन अगर संतुलित ना रहे तो व्यक्ति अपना व्यक्तित्व तक खो बैठता है । अपने बारे मे मुझे ऐसा लगता है कि मुझमे नकारात्मक विचार ज्यादा है और उसी वजह से ही मै आगे अपनी मंजिल की और नहीं बढ पा रहा हूँ ।मै इन नकारात्मक विचारों से जल्द से जल्द छुटकारा पाना चाहता हूँ  क्योंकि नकारात्मक विचार जीवन को कभी सकारात्मक रूख नहीं दे पायेंगे । सकारात्मक सोच जीवन में सदा ख़ुशियाँ ही लाती है । मैं हमेढर्रें पर लौट आता । परेशान हो गया हूँ अपनी इस मानसिक दुर्बलता से । अभी गीता पढ रहा हूँ ज्यादा नहीं अभी कुछ दोहे और उनका कुछ अर्थ ही पढा है । गीता मे कहा गया है आत्मा अनश्वर और अविकृत है । आत्मा मे परिवर्तन का कोई गुण नहीं है फिर मैं ये सोचने लगा कि परिवर्तन बिना संसार कैसे चलेगा । परिवर्तन तो संसार का नियम है और यही सुख और दुःख का मूल है फिर मन मे तर्क उठता है कि आत्मा सुख-दुःख और इस प्रकृति से भी परे है । गीता मे कहा गया है कि आत्मा चिंतन  का भी विषय नहीं है अर्थात आत्मा का चिंतन संभव ही नहीं है । मुझे तो सबसे कठिन कार्य जीवन मे सतुंलन बैठाना लगता है कभी एक चीज पर ध्यान दो तो लगता है कि दूसरे पर भी काम करना जरूरी है । एक को महत्व दो तो दूसरा कार्य भी महत्वपूर्ण लगने लगता है ऐसे में यहीं उलझन होती है क्या करे और क्या ना करे ।
शा से ही लकीर का फ़क़ीर रहा कारण कि मैं हमेशा अलग परिणाम की चाह में योजनाएँ बनाता पर कुछ ही दिनों मे फिर पुराने

शुक्रवार, 21 जून 2013

भव्य सुंदरकांड का आयोजन

अचलगंज ग्राम के माता महामाई के मंदिर मे भव्य सुंदरकांड का आयोजन हुआ जिसमे शामिल होकर बहुत ही आनन्द आया । आपसे उस पल को साझा करते हुए

सुंदरकांड का पाठ करते हुए भक्तगण


माता महामाई का मंदिर 


श्रंगारयुक्त शिवलिंग


माता महामाई की पावन प्रतिमा


राम भक्त हनुमान का दरबार


सोमवार, 17 जून 2013

मैहर की यात्रा

हम लोगों ने चित्रकूट से निकल कर फिर मैहर जाने का निश्चय किया । मैहर में माँ दुर्गा का शक्तिपीठ है जिनके नाम पर ही इस क्षेत्र का नाम मैहर है । चित्रकूट से हम बस द्वारा मैहर के लिए निकले । बस सतना जिले तक जाती है  सतना जिला वंही है जंहा पर सतना सीमेंट की फैक्ट्री है । सतना जिला काफी बड़ा है । वंहा से हमने फिर बस पकड़ी और पहुँच गए मैहर । वंह का वातावरण भक्तिमय है और साथ ही प्रसाद की दुकानें अनगिनत । वंहा प्रसाद की दुकानों में एक अच्छी व्यवस्था है आप उन्ही दुकानों में प्रसाद लीजिए और वही विश्राम भी कीजिए । वंहा पर हम लोगों ने थोड़ी देर विश्राम किया उसके बाद फिर हम लोगो ने चढाई प्रारंभ की ।वंहा मंदिर परिसर में  हम लोगो को बहुत ही सुकून महसूस हुआ आखिर माता के चरण के पास जो थे वहां हम लोगो ने माता मैहर के दर्शन किए फिर थोड़ी देर मन्दिर परिसर मे ही रूक कर वहां के परिदृश्य का आनंद लिया । फिर हम लोगो ने नीचे उतरना प्रारम्भ किया नीचे उतरने मे  आधा घन्टा लगा । वंहा उतर कर हम लोगो ने भोजन किया फिर थोडी देर विश्राम किया । हमे लालसा थी वंहा के बाजार देखने की सो हम थोडी देर बाद ही निकल पडे चित्रकूट के बाजारों मे वंहा ज्यादा कुछ नहीं बस थोडा बहुत सामान लिया । चित्रकूट की एक खास बात है कि वहां खाना वाजिब कीमत पर सही गुणवत्ता का मिलता है पर खाना गरिष्ठ होता है । चित्रकूट मे आनंद तो बहुत आया अरे हाँ वहां हम लोगो ने दूर से ही एक अखाडा देखा तो बताया गया कि ये अखाडा आल्हा ऊदल का है वे यहाँ कुश्ती किया करते थे ।  हम लोगो की ट्रेन नौ बजे की थी सो हम लोग स्टेशन मे ही रूकने का फैसला किया  फिर क्या ट्रेन आई और हम लोग निकल पडे घर कि ओर ।
अगली चिट्ठी मे चर्चा करेंगे की वो कौन सी जगह थी जो हमसे छूट गयी घूमने के लिए ।
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शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

चित्रकूट की यादें

चित्रकूट में मुझे तो बहुत अच्छा लगा वंह जो जगह मुझे सबसे ज्यादा पसंद आयी वो है राम दर्शन जंहा पहुँच कर ऐसा लगता है कि प्रभु श्री राम की जीवन की सारी घटनायें अपनी आँखों के सामने घटित हो रही है । राम दर्शन एक स्थान है जंहा पर प्रभु श्री राम के जीवन की सजीव झांकी है । उसके बाद मुझे रामघाट बहुत पंसद आया वंहा का वातावरण बहुत ही रमणीय लगा वंहा शाम की आरती भी दर्शनीय  है । राम गंगा में एक चीज दुखी करती है वो है जंहा पर लोग स्नान करते है वंही पर नाले का पानी गिरता है ।चित्रकूट में पंडो की वसूली भी जबरदस्त है वंहा के पंडो ने एक नया तरीका ईजाद किया है रूपए  लेने का किसी भी मंदिर में घुसते ही पुजारी आपके ऊपर गदा रखेगा और कहेगा अमुक व्यक्ति ने फंला रुपया दान दिया । लो जी अब जब घोषणा हो गई तो दान तो देना ही पड़ेगा । गुप्त गोदावरी गुफा में जब प्रवेश किया तभी उसकी प्राचीनता का एहसास हो जाता है । गुप्त गोदावरी में एक पवित्र एहसास होता है । वंहा जलधारा का निरंतर प्रवाह  गुफा के अन्दर होता रहता है । सती अनुसूइआ आश्रम का सरोवर  बहुत ही विशाल है जो बहुत ही स्वच्छ है जिसमे अनेको प्रकार की सुन्दर छोटी बड़ी मछलियाँ पाई जाती है ।कुल मिला कर चित्रकूट की यात्रा बहुत ही आनंदमयी रही । उसके बाद फिर हम माता मैहर वाली के दर्शन करने के लिए गए जिसकी चर्चा अगली कड़ी में

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

स्वाभिमान

किसी गाँव में रहने वाला एक छोटा लड़का अपने दोस्तों के साथ गंगा नदी के पार मेला देखने गया। शाम को वापस लौटते समय जब सभी दोस्त नदी किनारे पहुंचे तो लड़के ने नाव के किराये के लिए जेब में हाथ डाला। जेब में एक पाई भी नहीं थी। लड़का वहीं ठहर गया। उसने अपने दोस्तों से कहा कि वह और थोड़ी देर मेला देखेगा। वह नहीं चाहता था कि उसे अपने दोस्तों से नाव का किराया लेना पड़े। उसका स्वाभिमान उसे इसकी अनुमति नहीं दे रहा था।
उसके दोस्त नाव में बैठकर नदी पार चले गए। जब उनकी नाव आँखों से ओझल हो गई तब लड़के ने अपने कपड़े उतारकर उन्हें सर पर लपेट लिया और नदी में उतर गया। उस समय नदी उफान पर थी। बड़े-से-बड़ा तैराक भी आधे मील चौड़े पाट को पार करने की हिम्मत नहीं कर सकता था। पास खड़े मल्लाहों ने भी लड़के को रोकने की कोशिश की।
उस लड़के ने किसी की न सुनी और किसी भी खतरे की परवाह न करते हुए वह नदी में तैरने लगा। पानी का बहाव तेज़ था और नदी भी काफी गहरी थी। रास्ते में एक नाव वाले ने उसे अपनी नाव में सवार होने के लिए कहा लेकिन वह लड़का रुका नहीं, तैरता गया। कुछ देर बाद वह सकुशल दूसरी ओर पहुँच गया।
उस लड़के का नाम था ‘लालबहादुर शास्त्री’।

सोमवार, 8 अप्रैल 2013

चित्रकूट दर्शन

चित्रकूट में हम स्फटिक शिला के दर्शन के पश्चात् सती अनुसुइया के आश्रम गए वंहा आश्रम जैसा तो कुछ नहीं था पर विशाल मंदिर अवश्य था जिसके अन्दर उस समय की प्रमुख घटनाओं को वर्णन करते झाँकिमय मूर्तिया मौजूद थी उनमे से कई तो अत्यंत ही भव्य थी ।  उस मंदिर के सम्मुख ही एक अत्यंत सुन्दर और विशाल सरोवर है जिसमें अनेकों प्रकार की सुन्दर  मछलियाँ भी मौजूद है । वंहा काफी देर रुकने के पश्चात हम लोग गुप्त गोदावरी गए जंहा पर दो गुफाएँ मौजूद है एक गुफा का प्रवेश मार्ग थोडा संकरा है जिसके अन्दर निरंतर जलधारा का प्रवाह होता रहता है ।  गुफा के अन्दर का दृश्य बड़ा ही मनोरम है ।गुफा से निकलकर हम लोगों ने  वहीं पर थोड़ी देर विश्राम किया । उसके पश्चात् हम लोग फिर हनुमान धारा गए जंहा पर काफी उचांई पर हनुमान मंदिर स्थित है और वंहा की एक खास बात ये है कि वंहा पर जल धारा का प्रवाह लगातार होता रहता है वहीँ पर और ऊंचाई पर सीता रसोई स्थित है । वंहा से हम लोगो ने वापस आकर थोड़ी खरीदारी की जिसमे वंहा की बनी खूबसूरत लकड़ी की कार और कुछ चाबी के गुच्छे तथा अपने छोटे भांजे के लिए हाथ में पहनने वाले कंगन ।

रविवार, 7 अप्रैल 2013

चित्रकूट में दूसरा दिन

सुबह जल्दी ही हम सभी लोग तैयार हो गए । पहले हम लोग जानकी कुंड गए बताते है कि सीता माता यंहा स्नान करने आया करती थी । वंहा कुछ देर रुकने के उपरान्त हम लोग फिर राम दर्शन के लिए गए वंहा तो करीब एक घंटे हम लोग रुके । वंह पहुँच कर लगा जैसे प्रभु श्री राम की सारी जीवन गाथा सजीव हों गयी है । वंहा की झांकी में जितनी सजीविता है वैसी शायद ही कंही देखने को मिले । वंहा एक बात और अच्छी देखने को मिली वो ये कि रामायण जितनी भी विदेशी भाषाओं में लिखी गयी उन सबकी एक-एक प्रति वंहा पर मौजूद थी  ।साथ ही चीन रूस फ्रांस आदि जितने भी देशो में रामायण का मंचन हुआ है वंहा की फोटो मौजूद थी । वंहा फोटो खीचना मना था  इसलिए चाह कर भी फोटो नहीं खीच सका । इसके बाद हम लोग स्फटिक शिला देखने गए बताते है कि प्रभु श्री राम और माता सीता यंही पर बैठ कर चित्रकूट की सुन्दरता को निहारा करते थे । वंह पर माता सीता के पदचिन्ह अब भी मौजूद है ।

शनिवार, 30 मार्च 2013

चित्रकूट की यात्रा का पहला दिन

चित्रकूट में पहले दिन यानि कल पहले तो हम रामगंगा नहाने गये । आनन्द तो बहुत आया स्नान में लेकिन दुःख भी बहुत हुआ यंहा पर व्याप्त गन्दगी को देखकर । यंहा स्थानीय लोगो से बात करके मालूम हुआ कि प्रशासन एक प्लांट लगा रहा हें जो कि जल शोधन का कार्य करेगा पर पता नहीं इसे असली जामा कब तक पहुचाया जायगा । पर एक बात तो हैं कि गंगा में नहाकर तन मन में स्फूर्ति आ जाती हैं । गंगा में नहाने के बाद फिर थोड़ी देर आराम किया फिर हम लोग कामादानाथ मंदिर गए वंहा जाकर कामादानाथ की परिक्रमा की जिसका परिक्रमा पथ पांच किलोमीटर लम्बा है ।यंहा पर हम धर्मशाला में रुके थे जिसका नाम आगरा अग्रवाल धर्मशाला है । धर्मशाला की व्यवस्था संतोषजनक थी ।
जब शाम को हम परिक्रमा करके आये तो पेट में चूहे कूद रहे थे  तो फिर हम होटल  गए और वहां भोजन किया । वंहा का भोजन तो बढ़िया था पर वंहा एक व्यवस्था भोजन के थाली दर की है । वंहा पर 70 और 80 रूपये  की  थाल   है ।  फिलहाल पहला दिन तो आनंदमय रहा है ।

शुक्रवार, 29 मार्च 2013

चित्रकूट की यात्रा

आज चित्रकूट की यात्रा पर निकला हूँ ।काफी दिन से मन था कि प्रभु श्री राम ने जहाँ अपने वनवास का अधिकतम समय व्यतीत किया उस परम पुनीत पुण्य भूमि के दर्शन करूँ । उस जगह में जरुर कोई खास बात बात होगी जिसके लिए इस भूमि का चयन किया । चलो अब दो दिन चित्रकूट के दर्शन ही होंगे ।अभी तो फिलहाल बाँदा स्टेशन पंहुचा हूँ । शेष बाद में ।