चित्रकूट में मुझे तो बहुत अच्छा लगा वंह जो जगह मुझे सबसे ज्यादा पसंद आयी वो है राम दर्शन जंहा पहुँच कर ऐसा लगता है कि प्रभु श्री राम की जीवन की सारी घटनायें अपनी आँखों के सामने घटित हो रही है । राम दर्शन एक स्थान है जंहा पर प्रभु श्री राम के जीवन की सजीव झांकी है । उसके बाद मुझे रामघाट बहुत पंसद आया वंहा का वातावरण बहुत ही रमणीय लगा वंहा शाम की आरती भी दर्शनीय है । राम गंगा में एक चीज दुखी करती है वो है जंहा पर लोग स्नान करते है वंही पर नाले का पानी गिरता है ।चित्रकूट में पंडो की वसूली भी जबरदस्त है वंहा के पंडो ने एक नया तरीका ईजाद किया है रूपए लेने का किसी भी मंदिर में घुसते ही पुजारी आपके ऊपर गदा रखेगा और कहेगा अमुक व्यक्ति ने फंला रुपया दान दिया । लो जी अब जब घोषणा हो गई तो दान तो देना ही पड़ेगा । गुप्त गोदावरी गुफा में जब प्रवेश किया तभी उसकी प्राचीनता का एहसास हो जाता है । गुप्त गोदावरी में एक पवित्र एहसास होता है । वंहा जलधारा का निरंतर प्रवाह गुफा के अन्दर होता रहता है । सती अनुसूइआ आश्रम का सरोवर बहुत ही विशाल है जो बहुत ही स्वच्छ है जिसमे अनेको प्रकार की सुन्दर छोटी बड़ी मछलियाँ पाई जाती है ।कुल मिला कर चित्रकूट की यात्रा बहुत ही आनंदमयी रही । उसके बाद फिर हम माता मैहर वाली के दर्शन करने के लिए गए जिसकी चर्चा अगली कड़ी में
शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013
गुरुवार, 25 अप्रैल 2013
स्वाभिमान
किसी गाँव में रहने वाला एक छोटा लड़का अपने दोस्तों के साथ गंगा नदी के पार मेला देखने गया। शाम को वापस लौटते समय जब सभी दोस्त नदी किनारे पहुंचे तो लड़के ने नाव के किराये के लिए जेब में हाथ डाला। जेब में एक पाई भी नहीं थी। लड़का वहीं ठहर गया। उसने अपने दोस्तों से कहा कि वह और थोड़ी देर मेला देखेगा। वह नहीं चाहता था कि उसे अपने दोस्तों से नाव का किराया लेना पड़े। उसका स्वाभिमान उसे इसकी अनुमति नहीं दे रहा था।
उसके दोस्त नाव में बैठकर नदी पार चले गए। जब उनकी नाव आँखों से ओझल हो गई तब लड़के ने अपने कपड़े उतारकर उन्हें सर पर लपेट लिया और नदी में उतर गया। उस समय नदी उफान पर थी। बड़े-से-बड़ा तैराक भी आधे मील चौड़े पाट को पार करने की हिम्मत नहीं कर सकता था। पास खड़े मल्लाहों ने भी लड़के को रोकने की कोशिश की।
उस लड़के ने किसी की न सुनी और किसी भी खतरे की परवाह न करते हुए वह नदी में तैरने लगा। पानी का बहाव तेज़ था और नदी भी काफी गहरी थी। रास्ते में एक नाव वाले ने उसे अपनी नाव में सवार होने के लिए कहा लेकिन वह लड़का रुका नहीं, तैरता गया। कुछ देर बाद वह सकुशल दूसरी ओर पहुँच गया।
उस लड़के का नाम था ‘लालबहादुर शास्त्री’।
सोमवार, 8 अप्रैल 2013
चित्रकूट दर्शन
रविवार, 7 अप्रैल 2013
चित्रकूट में दूसरा दिन
सुबह जल्दी ही हम सभी लोग तैयार हो गए । पहले हम लोग जानकी कुंड गए बताते है कि सीता माता यंहा स्नान करने आया करती थी । वंहा कुछ देर रुकने के उपरान्त हम लोग फिर राम दर्शन के लिए गए वंहा तो करीब एक घंटे हम लोग रुके । वंह पहुँच कर लगा जैसे प्रभु श्री राम की सारी जीवन गाथा सजीव हों गयी है । वंहा की झांकी में जितनी सजीविता है वैसी शायद ही कंही देखने को मिले । वंहा एक बात और अच्छी देखने को मिली वो ये कि रामायण जितनी भी विदेशी भाषाओं में लिखी गयी उन सबकी एक-एक प्रति वंहा पर मौजूद थी ।साथ ही चीन रूस फ्रांस आदि जितने भी देशो में रामायण का मंचन हुआ है वंहा की फोटो मौजूद थी । वंहा फोटो खीचना मना था इसलिए चाह कर भी फोटो नहीं खीच सका । इसके बाद हम लोग स्फटिक शिला देखने गए बताते है कि प्रभु श्री राम और माता सीता यंही पर बैठ कर चित्रकूट की सुन्दरता को निहारा करते थे । वंह पर माता सीता के पदचिन्ह अब भी मौजूद है ।
शनिवार, 30 मार्च 2013
चित्रकूट की यात्रा का पहला दिन
जब शाम को हम परिक्रमा करके आये तो पेट में चूहे कूद रहे थे तो फिर हम होटल गए और वहां भोजन किया । वंहा का भोजन तो बढ़िया था पर वंहा एक व्यवस्था भोजन के थाली दर की है । वंहा पर 70 और 80 रूपये की थाल है । फिलहाल पहला दिन तो आनंदमय रहा है ।
शुक्रवार, 29 मार्च 2013
चित्रकूट की यात्रा
आज चित्रकूट की यात्रा पर निकला हूँ ।काफी दिन से मन था कि प्रभु श्री राम ने जहाँ अपने वनवास का अधिकतम समय व्यतीत किया उस परम पुनीत पुण्य भूमि के दर्शन करूँ । उस जगह में जरुर कोई खास बात बात होगी जिसके लिए इस भूमि का चयन किया । चलो अब दो दिन चित्रकूट के दर्शन ही होंगे ।अभी तो फिलहाल बाँदा स्टेशन पंहुचा हूँ । शेष बाद में ।
मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013
जीवन दर्शन
(मानस-२ से)
मेरा मूलमंत्र है जहाँ से जो कुछ अच्छा मिले, सीखना चाहिए ।
- स्वामी विवेकानन्द
सोमवार, 4 फ़रवरी 2013
सुकून के पल
सोमवार, 28 जनवरी 2013
जिन्दगी की व्यस्तता
बुधवार, 23 जनवरी 2013
जीवन दर्शन
सोमवार, 21 जनवरी 2013
नमस्कार
गुरुवार, 1 नवंबर 2012
मनुष्य परिवर्तन का सृष्टा
इतिहास का तत्व विभिन्न परिस्थितियों मे व्यक्ति और समाज की रचनात्मक क्षमता का विश्लेषण करता है । मनुष्य केवल परिस्थितियों को सुलझाता ही नहीं, वह परिस्थितियों का निर्माण भी करता है । वह प्राकृतिक और भौतिक परिस्थितियों में परिवर्तन करता है, समाजिक परिस्थितियों का वह सृष्टा है ।
इतिहास विश्वास की नहीं, विश्लेषण की वस्तु है। इतिहास मनुष्य का अपनी परम्परा में आत्म-विश्लेषण है । जैसे नदी मे प्रतिक्षण नवीन जल बहने पर भी नदी का अस्तित्व और उसका नाम नहीं बदलता वैसे ही किसी मे जन्म-मरण की निरन्तर क्रिया और व्यवहार के परिवर्तन से वह जाति नहीं बदल जाती । अतीत में अपने रचनात्मक सामथर्य और परिस्थितियों के सुलझाव और रचना के लिए निर्देश पाती है ।
इतिहास के मन्थन से प्राप्त अनुभव के अनेक रत्नों में सबसे प्रकाशमान तथ्य है- मनुष्य भोक्ता नहीं, कर्ता है । सम्पूर्ण माया मनुष्य की ही क्रीडा है । इसी सत्य को अनुभव कर हमारे विचारकों ने कहा था- "न मानुषात् श्रेष्ठतरं ही किंचित् !"
मनुष्य से बडा है केवल उसका अपना विश्वास और स्वयं उसका ही रचा हुआ विधान । अपने विश्वास और विधान के सम्मुख ही मनुष्य विवशता अनुभव करता है और स्वयं ही वह उसे बदल भी देता है ।
यह विचार चितंन प्रसिद्ध उपन्यासकार यशपाल जी का है जो उन्होने अपने उपन्यास दिव्या में प्रस्तुत किया है । उनका यह चिंतन आज के युग मे भी प्रासगिंक है ।
रविवार, 14 अक्टूबर 2012
न्याय
न्याय !!!
एक ग्वालिन नजदीक के शहर से दूध बेचकर वापस अपने गाँव आ रही थी। रास्ते में तालाब के किनारे थोड़ा -विश्राम करने बैठ गयी। वट वृक्ष की घनी छाया और पानी की ठंडी हिलोरें। थकावट के कारण ग्वालिन को नींद-सी आने लगी। उस पेड़ पर एक चंचल बन्दर का निवास था। इधर ग्वालिन को नींद आई और उधर वह बन्दर लोटे के पास रखी हुई पैसों की थैली ले भागा।
जागने पर ग्वालिन को पता लगा तो उसने बहुत देर तक बन्दर के निहोरे किये, उसके बार-बार हाथ जोड़े। काफी परेशान करने के बाद बंदर ने थैली खोली। एक पैसा तालाब के पानी में फेंकता और एक पैसा उसके लोटे में। ठीक आधी पूंजी ग्वालिन के पल्ले पड़ी। ग्वालिन को मन-ही-मन बड़ा अचरज हुआ कि यह बन्दर तो अदल न्यायी निकला, दूध के पैसे दूध में और पानी के पैसे पानी में। अनजाने में ही उसने न्यायोचित फैसला कर दिया।
साभार 'कादम्बिनी'
सफल जीवन का रहस्य
एक दिन स्वामी विवेकानन्द दुर्गाबाड़ी से माँ दुर्गा के दर्शन करके जब लौट रहे थे, तो बन्दरों का एक दल उनके पीछे लग गया। यह देखकर स्वामी जी ने कुछ भय से लम्बे-लम्बे डग भरने आरंभ कर दिए। बन्दरों ने भी उसी तेज गति से उनका पीछा जारी रखा। यह देखकर स्वामी जी और भी शंकित हो उठे और बन्दरों से छुटकारा पाने के लिए दौड़ने लगे। बन्दरों ने भी उनके पीछे दौड़ना आरंभ कर दिया। यह देखकर स्वामी जी और भी घबरा उठे और उन्हें अधिक तेज दौड़ने के सिवा बन्दरों से बच निकले का कोई दूसरा उपाय नहीं सूझ रहा था। दौड़ते-दौड़ते सांस फूलने लगी, परन्तु बन्दर थे कि पीछा छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहे थे। संयोग की बात हैं कि सामने से एक वृद्ध साधु आ रहा था। उसने संन्यासी विवेकानन्द की घबराहट की यह दशा देखकर उन्हें सम्बोधित करते हुए आवाज दी, ‘‘नौजवान रूक जाओ, भागो नहीं, बन्दरों की ओर मुँह करके खड़े हो जाओ।’’ वे बन्दरों की ओर मुँह करके खड़े हो गये। फिर क्या था, बन्दर ठिठक गए और कुछ ही क्षणों में बन्दर तितर-बितर हो गए।
इस घटना से एक बहुत बड़ी शिक्षा मिलती हैं, जो स्वामी जी ने ग्रहण की। वह यह हैं कि जीवन में विपत्तियों से छुटकारा पाने के लिए विपत्तियों का साहस पूर्वक सामना करना चाहिए। उन्होंने अमरीका के न्यूयार्क नगर में भाषण देते हुए इस घटना का वर्णन किया था और कहा, ‘‘इस प्रकार प्रकृति के विरूद्ध मुँह करके खड़े हो जाओ, अज्ञान के विरूद्ध, माया के विरूद्ध मुँह करके खड़े हो जाओ और भागो नहीं।’’ संसार में सफल जीवन बिताने का यही रहस्य हैं...
मंगलवार, 2 अक्टूबर 2012
देवनागरी(हिन्दी) मे लिखने का सरल तरीका
Microsoft Indic Language Input Tool
बहुधा लोग फेसबुक चैट और टिप्पणियों में सीधे देवनागरी में लिखते देख उसकी विधि और उपाय पूछते हैं।
जिन्हें कंप्यूटर पर सीधे देवनागरी में लिखने की विधि नहीं पता और वे सीधे देवनागरी में लिखना चाहते हैं वे माइक्रोसॉफ्ट का इंडिक लैंगवेज़ इनपुट टूल अपने कंप्यूटर में संस्थापित कर लें।
उसे यहाँ से
http://www.bhashaindia.com/ilit/
Install Desktop Version क्लिक कर डाऊनलोड करना होगा। यहीं पर दाहिनी ओर एक वीडियो ( Desktop Version Demo (captioned) भी दिया है जिसे देखकर क्रमवार उसी प्रकार करते जाएँ।
जिन्हें डेमो के वीडियो से उतना सुविधाजनक न प्रतीत हो वे यहाँ से सहायता लें और दिए गए निर्देशों का क्रमवार व अपने सिस्टम की आवश्यकतानुसार पालन करते जाएँ -
http://www.bhashaindia.com/ilit/GettingStarted.aspx?languageName=Hindi
आशा है, इसके पश्चात् आप सीधे देवनागरी में धाराप्रवाह लिखने लगेंगे।
जिन्हें देवनागरी लिखने पर सिस्टम में डिब्बे अथवा जंक-सा दिखाई देता हो वे यहाँ से सहायता ले सकते हैं -
http://www.bhashaindia.com/ilit/ComplexScriptSupport.aspx?languageName=Hindi
कोई असुविधा हो तो पूछ सकते हैं।
साभार - डॅा कविता वाचक्नवी
शनिवार, 29 सितंबर 2012
कर्मों का फल
जब
भीष्म पितामह ने पूछा -
"मेरे
कौन से
कर्म
का फल है जो मैं सरसैया पर पड़ा
हुआ
हूँ?''
बात प्राचीन
महाभारत काल की है।
महाभारत
के युद्ध में जो कुरुक्षेत्र
के मैंदान
में
हुआ, जिसमें
अठारह
अक्षौहणी
सेना मारी गई, इ
स
युद्ध के समापन और
सभी
मृतकों को तिलांज्जलि देने
के बाद
पांडवों
सहित श्री कृष्ण पितामह भीष्म
से
आशीर्वाद लेकर
हस्तिनापुर को वापिस
हुए
तब श्रीकृष्ण को रोक कर पितामाह
ने
श्रीकृष्ण से
पूछ ही लिया, "मधुसूदन,
मेरे
कौन
से कर्म का फल है जो मैं सर
सैया
पर पड़ा हुआ हूँ?'' यह
बात सुनकर
मधुसूदन
मुस्कराये और पितामह भीष्म
से
पूछा, 'पितामह
आपको कुछ पूर्व
जन्मों
का ज्ञान है?'' इस पर
पितामह ने
कहा,
'हाँ''।
श्रीकृष्ण मुझे अपने सौ
पूर्व
जन्मों का
ज्ञान है कि मैंने
किसी
व्यक्ति का कभी अहित नहीं
किया?
इस पर श्रीकृष्ण
मुस्कराये और बोले
पितामह
आपने ठीक कहा कि आपने
कभी
किसी को कष्ट नहीं दिया,
लेकिन एक
सौ
एक वें पूर्वजन्म में आज की
तरह तुमने तब
भी
राजवंश में जन्म लिया था और
अपने पुण्य
कर्मों
से बार-बार राजवंश
में जन्म लेते रहे,
लेकिन
उस जन्म में जब तुम युवराज थे,
तब एक
बार
आप शिकार खेलकर जंगल से निकल
रहे
थे, तभी
आपके घोड़े के अग्रभाग पर
एक
करकैंटा एक
वृक्ष से नीचे गिरा। आपने
अपने
बाण से उठाकर
उसे पीठ के पीछे फेंक दिया,
उस
समय वह बेरिया के पेड़ पर जा
कर
गिरा और बेरिया
के कांटे उसकी पीठ में धंस
गये
क्योंकि पीठ के बल ही जाकर
गिरा
था? करकेंटा जितना
निकलने
की कोशिश
करता उतना ही कांटे
उसकी
पीठ में चुभ जाते और इस
प्रकार
करकेंटा
अठारह दिन जीवित रहा और
यही
ईश्वर से प्रार्थना करता रहा,
'हे
युवराज!
जिस तरह से मैं तड़प-तड़प
कर मृत्यु
को
प्राप्त हो रहा हूँ, ठीक
इसी प्रकार
तुम
भी होना।'' तो, हे
पितामह भीष्म!
तुम्हारे
पुण्य कर्मों की वजह से आज तक
तुम
पर करकेंटा
का श्राप लागू नहीं हो पाया।
लेकिन
हस्तिनापुर की राज सभा में
द्रोपदी
का चीर-हरण होता
रहा और आप
मूक दर्शक
बनकर देखते रहे। जबकि आप
सक्षम
थे उस अबला
पर अत्याचार रोकने में,
लेकिन
आपने
दुर्योधन और दुःशासन
को
नहीं रोका। इसी कारण पितामह
आपके
सारे पुण्यकर्म
क्षीण हो गये और
करकेंटा
का 'श्राप' आप
पर लागू हो गया।
अतः
पितामह प्रत्येक मनुष्य को
अपने
कर्मों का
फल कभी न
कभी तो
भोगना ही पड़ेगा।
प्रकृति
सर्वोपरि है, इसका
न्याय
सर्वोपरि
और प्रिय है। इसलिए पृथ्वी
पर
निवास करने
वाले प्रत्येक प्राणी व
जीव
जन्तु को भी
भोगना पड़ता है और कर्मों
के
ही अनुसार ही
जन्म होता है।
मंगलवार, 25 सितंबर 2012
स्वामी विवेकानन्द
स्वामी विवेकानंद ने 11 सितंबर 1893
को शिकागो (अमेरिका) में हुए विश्व धर्म
सम्मेलन में एक बेहद चर्चित भाषण दिया था।
विवेकानंद का जब भी जिक्र आता है उनके इस
का यह भाषण...
अमेरिका के बहनो और भाइयो
...
आपके इस स्नेहपूर्ण और जोरदार स्वागत से
मेरा हृदय अपार हर्ष से भर गया है। मैं
आपको दुनिया की सबसे प्राचीन संत
परंपरा की तरफ से धन्यवाद देता हूं। मैं
आपको सभी धर्मों की जननी की तरफ से
धन्यवाद देता हूं और सभी जाति, संप्रदाय के लाखों, करोड़ों हिन्दुओं की तरफ से
आपका आभार व्यक्त करता हूं। मेरा धन्यवाद कुछ
उन वक्ताओं को भी जिन्होंने इस मंच से यह
कहा कि दुनिया में सहनशीलता का विचार सुदूर
पूरब के देशों से फैला है।
मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे
धर्म से हूं, जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम
सिर्फ सार्वभौमिक सहनशीलता में
ही विश्वास नहीं रखते, बल्कि हम विश्व के
सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं।
मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे देश से हूं, जिसने इस
धरती के सभी देशों और धर्मों के परेशान और
सताए गए लोगों को शरण दी है। मुझे यह बताते
हुए गर्व हो रहा है कि हमने अपने हृदय में उन
इस्त्राइलियों की पवित्र स्मृतियां संजोकर
रखी हैं, जिनके धर्म स्थलों को रोमन हमलावरों ने तोड़-तोड़कर खंडहर बना दिया था।
और तब उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली थी।
मुझे इस बात का गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं,
जिसने महान पारसी धर्म के लोगों को शरण
दी और अभी भी उन्हें पाल-पोस रहा है।
भाइयो,
मैं आपको एक श्लोक की कुछ पंक्तियां सुनाना चाहूंगा जिसे मैंने बचपन से
स्मरण किया और दोहराया है और जो रोज
करोड़ों लोगों द्वारा हर दिन दोहराया जाता है:
जिस तरह अलग-अलग स्त्रोतों से
निकली विभिन्न नदियां अंत में समुद में
जाकर मिलती हैं, उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा के अनुरूप अलग-अलग मार्ग
चुनता है। वे देखने में भले ही सीधे या टेढ़े-मेढ़े लगें,
पर सभी भगवान तक ही जाते हैं। वर्तमान सम्मेलन जोकि आज तक की सबसे
पवित्र सभाओं में से है, गीता में बताए गए इस
सिद्धांत का प्रमाण है: जो भी मुझ तक आता है,
चाहे वह कैसा भी हो, मैं उस तक पहुंचता हूं। लोग
चाहे कोई भी रास्ता चुनें, आखिर में मुझ तक
ही पहुंचते हैं।
सांप्रदायिकताएं, कट्टरताएं और इसके भयानक
वंशज हठधमिर्ता लंबे समय से पृथ्वी को अपने
शिकंजों में जकड़े हुए हैं। इन्होंने
पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है। कितनी बार
ही यह धरती खून से लाल हुई है।
कितनी ही सभ्यताओं का विनाश हुआ है और न जाने कितने देश नष्ट हुए हैं। अगर ये भयानक राक्षस नहीं होते तो आज मानव
समाज कहीं ज्यादा उन्नत होता, लेकिन अब
उनका समय पूरा हो चुका है। मुझे पूरी उम्मीद है
कि आज इस सम्मेलन का शंखनाद
सभी हठधर्मिताओं, हर तरह के क्लेश, चाहे वे
तलवार से हों या कलम से और सभी मनुष्यों के बीच की दुर्भावनाओं का विनाश करेगा।
सोमवार, 24 सितंबर 2012
क्रोध पर विजय
एक 12-13 साल
के लड़के को बहुत क्रोध आता
था। उसके पिता ने उसे ढेर सारी
कीलें दीं और कहा कि जब भी उसे
क्रोध आए वो घर के सामने लगे
पेड़ में वह कीलें ठोंक दे।
पहले
दिन लड़के ने पेड़ में 30
कीलें ठोंकी। अगले
कुछ हफ्तों में उसे अपने क्रोध
पर धीरे-धीरे नियंत्रण
करना आ गया। अब वह पेड़ में
प्रतिदिन इक्का-दुक्का
कीलें ही ठोंकता था। उसे यह
समझ में आ गया था कि पेड़ में
कीलें ठोंकने के बजाय क्रोध
पर नियंत्रण करना आसान था।
एक दिन ऐसा भी आया जब उसने पेड़
में एक भी कील नहीं ठोंकी। जब
उसने अपने पिता को यह बताया
तो पिता ने उससे कहा कि वह सारी
कीलों को पेड़ से निकाल दे।
लड़के
ने बड़ी मेहनत करके जैसे-तैसे
पेड़ से सारी कीलें खींचकर
निकाल दीं। जब उसने अपने पिता
को काम पूरा हो जाने के बारे
में बताया तो पिता बेटे का हाथ
थामकर उसे पेड़ के पास लेकर
गया।
पिता ने पेड़
को देखते हुए बेटे से कहा –
“तुमने बहुत अच्छा काम किया,
मेरे बेटे, लेकिन
पेड़ के तने पर बने सैकडों
कीलों के इन निशानों को देखो।
अब यह पेड़ इतना खूबसूरत नहीं
रहा। हर बार जब तुम क्रोध किया
करते थे तब इसी तरह के निशान
दूसरों के मन पर बन जाते थे।
अगर
तुम किसी के पेट में छुरा घोंपकर
बाद में हजारों बार माफी मांग
भी लो तब भी घाव का निशान वहां
हमेशा बना रहेगा।
अपने
मन-वचन-कर्म
से कभी भी ऐसा कृत्य न करो जिसके
लिए तुम्हें सदैव पछताना
पड़े...!!
गुरुवार, 20 सितंबर 2012
बहुत बङी सीख
बहुत
समय पहले की बात है एक बड़ा सा तालाब था उसमें सैकड़ों मेंढक रहते थे।
तालाब में कोई राजा नहीं था, सच मानो तो सभी राजा थे। दिन पर दिन
अनुशासनहीनता बढ़ती जाती थी और स्थिति को नियंत्रण में करने वाला कोई नहीं
था। उसे ठीक करने का कोई यंत्र तंत्र मंत्र दिखाई नहीं देता था। नई पीढ़ी
उत्तरदायित्व हीन थी। जो थोड़े बहुत होशियार मेंढक निकलते थे वे पढ़-लिखकर
अपना तालाब सुधारने की बजाय दूसरे तालाबों में चैन से जा बसते थे।
हार कर कुछ बूढ़े मेंढकों ने घनी तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न कर लिया
और उनसे आग्रह किया कि तालाब के लिये कोई राजा भेज दें। जिससे उनके तालाब
में सुख चैन स्थापित हो सके। शिव जी ने प्रसन्न होकर "नंदी" को उनकी देखभाल
के लिये भेज दिया। नंदी तालाब के किनारे इधर उधर घूमता, पहरेदारी करता
लेकिन न वह उनकी भाषा समझता था न उनकी आवश्यकताएँ। अलबत्ता उसके खुर से
कुचलकर अक्सर कोई न कोई मेंढक मर जाता। समस्या दूर होने की बजाय और बढ़ गई
थी। पहले तो केवल झगड़े झंझट होते थे लेकिन अब तो मौतें भी होने लगीं।
फिर से कुछ बूढ़े मेंढकों ने तपस्या से शिव जी को प
्रसन्न
किया और राजा को बदल देने की प्रार्थना की। शिव जी ने उनकी बात का सम्मान
करते हुए नंदी को वापस बुला लिया और अपने गले के सर्प को राजा बनाकर भेज
दिया। फिर क्या था वह पहरेदारी करते समय एक दो मेंढक चट कर जाता। मेंढक
उसके भोजन जो थे। मेंढक बुरी तरह से परेशानी में घिर गए थे।
फिर से मेंढकों ने घबराकर अपनी तपस्या से भोलेशंकर को प्रसन्न किया
शिव भी थे तो भोलेबाबा ही, सो जल्दी से प्रकट हो गए। मेंढकों ने कहा,
'आपका भेजा हुआ कोई भी राजा हमारे तालाब में व्यवस्था नहीं बना पाया। समझ
में नहीं आता कि हमारे कष्ट कैसे दूर होंगे। कोई यंत्र या मंत्र काम नहीं
करता। आप ही बताएँ हम क्या करें?'
इस बार शिव जी जरा गंभीर हो
गए। थोड़ा रुक कर बोले, यंत्र मंत्र छोड़ो और स्वतंत्र स्थापित करो। मैं
तुम्हें यही शिक्षा देना चाहता था। तुम्हें क्या चाहिये और तुम्हारे लिये
क्या उपयोगी वह केवल तुम्हीं अच्छी तरह समझ सकते हो। किसी भी तंत्र में
बाहर से भेजा गया कोई भी विदेशी शासन या नियम चाहे वह कितना ही अच्छा क्यों
न हो तुम्हारे लिये अच्छा नहीं हो सकता। इसलिये अपना स्वाभिमान जागृत करो,
संगठित बनो, अपना तंत्र बनाओ और उसे लागू करो। अपनी आवश्यकताएँ समझो,
गलतियों से सीखो। माँगने से सबकुछ प्राप्त नहीं होता, अपने परिश्रम का
मूल्य समझो और समझदारी से अपना तंत्र विकसित करो।
मालूम नहीं फिर से उस तालाब में शांति स्थापित हो सकी या नहीं। लेकिन इस कथा से भारतवासी भी बहुत कुछ सीख सकते हैं...
हार कर कुछ बूढ़े मेंढकों ने घनी तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न कर लिया और उनसे आग्रह किया कि तालाब के लिये कोई राजा भेज दें। जिससे उनके तालाब में सुख चैन स्थापित हो सके। शिव जी ने प्रसन्न होकर "नंदी" को उनकी देखभाल के लिये भेज दिया। नंदी तालाब के किनारे इधर उधर घूमता, पहरेदारी करता लेकिन न वह उनकी भाषा समझता था न उनकी आवश्यकताएँ। अलबत्ता उसके खुर से कुचलकर अक्सर कोई न कोई मेंढक मर जाता। समस्या दूर होने की बजाय और बढ़ गई थी। पहले तो केवल झगड़े झंझट होते थे लेकिन अब तो मौतें भी होने लगीं।
फिर से कुछ बूढ़े मेंढकों ने तपस्या से शिव जी को प
फिर से मेंढकों ने घबराकर अपनी तपस्या से भोलेशंकर को प्रसन्न किया
शिव भी थे तो भोलेबाबा ही, सो जल्दी से प्रकट हो गए। मेंढकों ने कहा, 'आपका भेजा हुआ कोई भी राजा हमारे तालाब में व्यवस्था नहीं बना पाया। समझ में नहीं आता कि हमारे कष्ट कैसे दूर होंगे। कोई यंत्र या मंत्र काम नहीं करता। आप ही बताएँ हम क्या करें?'
इस बार शिव जी जरा गंभीर हो गए। थोड़ा रुक कर बोले, यंत्र मंत्र छोड़ो और स्वतंत्र स्थापित करो। मैं तुम्हें यही शिक्षा देना चाहता था। तुम्हें क्या चाहिये और तुम्हारे लिये क्या उपयोगी वह केवल तुम्हीं अच्छी तरह समझ सकते हो। किसी भी तंत्र में बाहर से भेजा गया कोई भी विदेशी शासन या नियम चाहे वह कितना ही अच्छा क्यों न हो तुम्हारे लिये अच्छा नहीं हो सकता। इसलिये अपना स्वाभिमान जागृत करो, संगठित बनो, अपना तंत्र बनाओ और उसे लागू करो। अपनी आवश्यकताएँ समझो, गलतियों से सीखो। माँगने से सबकुछ प्राप्त नहीं होता, अपने परिश्रम का मूल्य समझो और समझदारी से अपना तंत्र विकसित करो।
मालूम नहीं फिर से उस तालाब में शांति स्थापित हो सकी या नहीं। लेकिन इस कथा से भारतवासी भी बहुत कुछ सीख सकते हैं...

